
तीन सव साल पहिले जे झारखंडीमन अपन घर-दूरा आउर देस छोइड़ के हिआँ से चइल गेलयँ ऊमन कहाँ हयँ? का करत हयँ? कोन हालइत में हयँ? ई केउ नि जानयँना। हमिन ऊमन के बिसराय जाय ही। जीवता हयँ कि मोइर गेलयँ। कोनो खबइर नखे।
तीन सव साल पहिले जे झारखंडीमन अपन घर-दूरा आउर देस छोइड़ के हिआँ से चइल गेलयँ ऊमन कहाँ हयँ? का करत हयँ? कोन हालइत में हयँ? ई केउ नि जानयँना। हमिन ऊमन के बिसराय जाय ही। जीवता हयँ कि मोइर गेलयँ। कोनो खबइर नखे।
ऑपरेशन ग्रीन हंट सरकार दन ले उछालल गेल एगो जुमला हय, इया कोनो बिसेस रननीति के अंजाम देवेक कर कवायद। ई सवाल जेतइ सपाट हय, उकर जबाबो उतनेहें सपाट हय। लगिन उकर जबाब से सरकार कोनो इत्तेफाक नइ रखेला। सरकारी बयान कर मासूमियत बतायला कि ई ऑपरेशन बिकास कर संडक में आवे वाला बाधामन के दुरुस्त करेक कर अभियान भइर हय। ई जुदा बात हय कि इकर सउबसे जादा खामियाजा ऊ बर्ग भुगती, जेकर ठन बिकास कर आपन अवधारना हय।
झारखंड कर मौजूदा राजनीति सिरिफ राइजे कर नइ देस कर करोड़ों आदिवासीमन कर जोन सांस्कृतिक आउर बौद्धिक नेतृत्व कर उपेक्षा करलक उके भारत सरकार ‘पद्मश्री’ सनमान से बिभूसित कइर हे। डॉ. रामदयाल मुंडा ई भारतीय सनमान पावेकवाला दोसर झारखंडी आदिवासी हयँ। इकर से पहिले ई सनमान संताली संस्कृतिकर्मी चित्त टुडू के अबिभाजित बिहार में मिल चुइक हे।
डुवार्स-तराई कर इलाका कर आदिवासी मनक लड़इ आब आस्ते-आस्ते राजनीतिक लड़इ बइन जाय हे। अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद कर बैनर में सुरू होवल सामाजिक अधिकार आउर पहचान कर लड़इ रोज दिना नवाँ रूप धरेक लाइग हय जेकर से गोरखा आउर माकपा कर राजनीतिक समीकरन हिआँ एकदम गड़बड़ाय जाय हे।
मातृभाषा के बिना विकास संभव नहीं : सुभाष गाताड़े
झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा की ओर से आयोजित दो दिवसीय महासम्मेलन में जनजातीय भाषाओं को बचाने की चिंता साफ नजर आई। शुक्रवार को सत्र का उद्घाटन करते हुए स्तंभकार व दलित चिंतक सुभाष गाताड़े ने मुंडारी गीत की पंक्तियों से शुरुआत करते हुए कहा कि शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होनी चाहिए। बिना इसके विकास संभव नहीं है।